संपादक के कलम से...नवरात्रि आए आस्था अउ उमंग के महापर्व। - Sarvavyapi संपादक के कलम से...नवरात्रि आए आस्था अउ उमंग के महापर्व। - Sarvavyapi

संपादक के कलम से…नवरात्रि आए आस्था अउ उमंग के महापर्व।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ के माटी मं नवरात्रि परब के अलगच छटा देखे ला मिलथे। गली-मोहल्ला, गाँव-गाँव ले शहर-शहर तक सब्बो झिन अपन-अपन तरीका ले माता दुर्गा के आराधना मं गुथ जाथें। नवरात्रि सिरिफ पूजा-पाठ के परब नइये, ये हमर समाजिक, सांस्कृतिक अउ आध्यात्मिक पहचान घलो आय।नवरात्रि मं बिहान ले सांझ तक घर-घर मं घटस्थापना होथे। माई दुर्गा के कलश मं जल, आम के पात अउ नारियल रखके, लाल कपड़ा बाँध के माता के आवाहन करे जाथे। गाँव के मड़ई ले शहर के बड़े-बड़े पंडाल तक, सब्बो जगा माता रानी के झांकी बने रहिथे। डमरू, मंजीरा अउ ढोलक के थाप मं भजन गूंजथे। चौकी-भजन मं गांव के मया-दया झलकथे। “जय माता दी” के गूंज मं भक्ति के उमंग भर जाथे। उपवास अउ नियम-निष्ठा निभावत लोगन अपन आत्मा ला पवित्र बनाथें।छत्तीसगढ़ के नवरात्रि मं गरबा अउ ददरिया के घलो अपन खास पहचान आय। नारी-पुरुष सब्बो झिन दउरी पकड़के गोल मं नाचथें, त फेर कतको जगा रात भर जगराता होथे। ये जगराता सिरिफ भक्ति नइ, बलुक समाजिक एकता के प्रतीक घलो बन जाथे। नवरात्रि मं माता के नौ रूप ला पूजा जाथे। छत्तीसगढ़ के जनमानस बर ये संदेश आय कि नारी शक्ति के बिना संसार अधूरा आय। नवरात्रि, नारी सम्मान अउ शक्ति के परब घलो आय। गाँव-गाँव मं देवी जगराता, मेला अउ झांकी के संगे व्यापारिक गतिविधि घलो बढ़ जाथे। हल्दी, सिंदूर, चुनरी, नारियल, फल-फूल के दुकान चमक उठथे। लोगन अपन-अपन जात-जवार, वर्ग-बिरादरी के भेद भुलाके एके मं गुथ जाथें।नवरात्रि हमर छत्तीसगढ़िया संस्कृति मं आस्था, भक्ति, उमंग अउ सामाजिक एकता के महापर्व आय। ये परब मं सिरिफ देवी पूजा नइ, बलुक हमर समाज ला जोड़े रखे के संकल्प घलो लुकाय रहिथे।


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