तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ सरकार एक तरफ बड़े-बड़े बैनर और आदेश जारी कर रही है कि शिक्षकों को मूल शिक्षकीय कार्यों से हटाकर किसी अन्य विभाग या निजी कार्यों में नहीं लगाया जाएगा। लेकिन हकीकत में मामला ठीक उल्टा है। स्कूल शिक्षा विभाग में संलग्नीकरण (अटैचमेंट) का खेल अभी भी पूरी तरह जारी है और सत्ता के रसूख के आगे नियम–कानून धरे के धरे रह जाते हैं।ताजा मामला रायपुर जिले के धरसींवा विकासखंड के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय तुलसी बाराडेरा की व्याख्याता गिरिजा साहू का है। लोक शिक्षण संचालनालय ने अपने पत्र क्रमांक/स्था02/व्यवस्था/09/2024/1109 नवा रायपुर, दिनांक 04/03/2024 के तहत आदेश जारी कर दिया कि उन्हें सीधे रायपुर ग्रामीण विधायक मोतीलाल साहू के निजी स्थापना में कार्य करना होगा।अब सवाल यह उठता है कि क्या विधायक कार्यालय कोई शैक्षणिक संस्था है? क्या वहां विद्यार्थी बैठकर गणित, भौतिकी या हिंदी की कक्षाएं लगाएंगे? या फिर अब शिक्षक “ब्लैकबोर्ड” की जगह “पॉलिटिकल बोर्ड” पर पाठ पढ़ाएंगे?सरकार ने स्वयं आदेश दिया कि शिक्षक अपनी मूल ड्यूटी यानी बच्चों को पढ़ाना ही करेंगे। लेकिन हकीकत में शिक्षक विधायक के निजी स्टाफ बन रहे हैं। और यह सब तब हो रहा है, जब शिक्षकों की भारी कमी से सरकारी स्कूलों की स्थिति पहले से ही बदहाल है। गांव–गांव में कक्षाएं खाली पड़ी हैं, बच्चे बिन शिक्षक भटक रहे हैं, लेकिन एक शिक्षिका को सत्ता की सेवा में झोंक दिया गया है।यह नियुक्ति इसलिए और भी विवादास्पद है क्योंकि संलग्न की गई शिक्षिका गिरिजा साहू, विधायक मोतीलाल साहू की करीबी रिश्तेदार हैं। यानी “रसूख” और “परिवारवाद” दोनों की छत्रछाया में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सत्ता पक्ष की भाजपा बार–बार यह दावा करती है कि वे “पारदर्शिता और नियम आधारित शासन” चला रहे हैं। लेकिन सवाल है , क्या यह पारदर्शिता है या पारिवारिक लाभ पहुंचाने का सीधा–सपाट उदाहरण है।गांव के लोग व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि अब शायद विधायक जी के ऑफिस में बच्चों के लिए ‘राजनीति पाठशाला’ शुरू होगी। जहां बच्चे पढ़ेंगे कैसे नियमों को तोड़ा जाता है, कैसे रिश्तेदारी में नौकरी बांटी जाती है और कैसे सत्ता के रसूख से कानून बदल जाता है। यह मामला केवल एक शिक्षिका का नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की साख से जुड़ा है। जब शिक्षक स्कूलों से हटाकर विधायक कार्यालयों में बैठाए जाएंगे, तो शिक्षा की गुणवत्ता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। नियमों का मखौल उड़ाकर सत्ता यह संदेश दे रही है कि कक्षा में नहीं, सत्ता की कुर्सी पर ही असली पाठ पढ़ाए जाते हैं।


