छत्तीसगढ़ की नई पहचान - अफसर, मंत्री और रिश्तेदारों का ‘भ्रष्टाचार विश्वविद्यालय’। - Sarvavyapi छत्तीसगढ़ की नई पहचान - अफसर, मंत्री और रिश्तेदारों का ‘भ्रष्टाचार विश्वविद्यालय’। - Sarvavyapi

छत्तीसगढ़ की नई पहचान – अफसर, मंत्री और रिश्तेदारों का ‘भ्रष्टाचार विश्वविद्यालय’।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन चाहे कांग्रेस की सरकार हो या फिर भाजपा की एक परंपरा कभी नहीं टूटी। यह परंपरा है भ्रष्टाचार की गाथा लिखने की परंपरा। रमन सिंह की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार में जो भ्रष्टाचार के अध्याय लिखे गए, वही सिलसिला भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार में भी जारी रहा और अब वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार में भी यह “परंपरा” अक्षुण्ण बनी हुई है। फर्क बस इतना है कि हर बार जनता यह सोचकर वोट करती है कि शायद अगली सरकार बेहतर होगी, लेकिन परिणाम वही निकलता है, “भ्रष्टाचार का अगला खंड”।आज की हकीकत यह है कि मंत्रियों से लेकर अफसरों तक, सबकी “कमाई का ग्राफ” जनता के विश्वास से ज्यादा ऊँचा है। देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित परीक्षा पास कर आईएएस-आईपीएस बनने वाले अफसर खुद को मंत्री समझ बैठे हैं। जिम्मेदारी और सेवा की जगह, वे भी “भ्रष्टाचार का इतिहास” लिखने में व्यस्त हैं।पूर्ववर्ती कांग्रेस और भाजपा सरकार के कई वरिष्ठ आईएएस अफसर आज सीबीआई और ईडी की हिरासत में हैं, कुछ जेल की हवा खा चुके हैं तो कुछ जमानत पर रिहा होकर प्रदेश से बाहर चैन की जिंदगी जी रहे हैं। नतीजा यह है कि छत्तीसगढ़ की जनता खुद को शर्मिंदा महसूस कर रही है कि जिन नेताओं और अफसरों पर उन्होंने भरोसा जताया, वे अरबों की संपत्ति खड़ी कर ऐशो-आराम में लिप्त हैं।और तो और, आज की विष्णु देव साय सरकार में भी कुछ अफसर चाहे आईएएस हों या राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी इसी राह पर तेजी से बढ़ रहे हैं। सवाल यह है कि जब सत्ता में बैठे लोग ही भ्रष्टाचार को मौन सहमति दे दें तो कार्रवाई करने की हिम्मत किसमें बचेगी? यही कारण है कि वर्तमान में कोई भी अफसर, नेता या ठेकेदार सरकार के खिलाफ उंगली उठाने की हिम्मत नहीं करता। सबको पता है कि भ्रष्टाचार की परतें तुरंत नहीं खुलेंगी,ये परतें पाँच साल बाद किसी नई सरकार के आने पर ही खुलेगी।लेकिन तब तक जो जनता ठगी जाती है, जो सपने टूटते हैं और जो मेहनतकश छत्तीसगढ़िया पसीना बहाकर टैक्स भरते हैं, उनकी आवाज़ सत्ता और अफसरशाही की चकाचौंध में कहीं खो जाती है।आज जरूरत है कि वर्तमान सरकार आत्ममंथन करे। क्योंकि जिस “मार्ग” पर उसके अफसर और मंत्री चल रहे हैं, वह सीधे जेल के दरवाजे तक जाता है। इतिहास गवाह है—“ऐसी कमाई भी क्या, जिसमें जेल की हवा खानी पड़े।


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