गरिमा का सच भारी पड़ा, संजय का आदेश समझ न आया,भ्रष्टाचारियों का कवच या कलेक्टर का फैसला- टंक ही बताएगा..? - Sarvavyapi गरिमा का सच भारी पड़ा, संजय का आदेश समझ न आया,भ्रष्टाचारियों का कवच या कलेक्टर का फैसला- टंक ही बताएगा..? - Sarvavyapi

गरिमा का सच भारी पड़ा, संजय का आदेश समझ न आया,भ्रष्टाचारियों का कवच या कलेक्टर का फैसला- टंक ही बताएगा..?

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर जिले की प्रशासनिक व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। चर्चाओं का केंद्र बनीं तहसीलदार गरिमा ठाकुर, जिन्होंने कुछ माह पूर्व ईओडब्ल्यू प्रमाण पत्र फर्जी सिंडीकेट का खुलासा कर प्रशासन और राजनैतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी, उन्हें कल ही में कलेक्टर संजय अग्रवाल ने बिलासपुर तहसील में अतिरिक्त तहसीलदार के रूप में पदस्थ किया है। इस निर्णय के पीछे छिपे संकेत और दबाव अब राजनीतिक व प्रशासनिक बहस का हिस्सा बन गए हैं। जिसकी खबर मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा तक जा पहुंची है। विभागीय सूत्र बताते हैं कि गरिमा ठाकुर ने अपने तहसीलदार के कार्यकाल में प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में फैले गहरे फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया था। यह सिंडीकेट प्रशासनिक तंत्र से लेकर दलाल नेटवर्क तक फैला हुआ था। फर्जी प्रमाण पत्र बनवाने का कारोबार वर्षों से फल-फूल रहा था, जिसका प्रत्यक्ष आर्थिक व राजनीतिक लाभ कुछ चुनिंदा प्रभावशाली लोगों को मिलता था। इस खुलासे के बाद तहसील कार्यालय के कई कर्मचारी और संबंधित दलाल सीधे जांच के घेरे में आए।ऐसे समय में, जब इस फर्जीवाड़े के कई धागे अभी तक पूरी तरह सुलझे नहीं हैं, अचानक गरिमा ठाकुर का बिलासपुर तहसील में अतिरिक्त तहसीलदार बनना, प्रशासनिक निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। और कलेक्टर संजय अग्रवाल की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। क्या कलेक्टर संजय अग्रवाल ने यह कदम दबाव में उठाया? या फिर यह निर्णय उन राजनैतिक ताकतों की ओर इशारा करता है, जिनके हित इस फर्जी सिंडीकेट में जुड़े हुए थे?प्रशासनिक स्तर पर भी यह सवाल उठ रहा है कि एक अधिकारी, जिसने भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ किया, उसे क्यों पुरस्कृत या दंडित करने जैसी स्थिति में लाकर खड़ा किया गया?बिलासपुर की राजनीति में तहसील स्तर की पोस्टिंग हमेशा संवेदनशील मानी जाती है। स्थानीय नेताओं और प्रभावशाली परिवारों की सीधी रुचि यहां रहती है क्योंकि राजस्व और भूमि संबंधी फैसले सीधे जनता और जमीन से जुड़े होते हैं। जानकारों का मानना है कि गरिमा ठाकुर की यह पोस्टिंग किसी “समझौते” का नतीजा हो सकती है, जहां एक तरफ उन्हें मुख्य धारा से अलग नहीं किया गया, वहीं दूसरी तरफ उनके अधिकारों को सीमित कर दिया गया ताकि बड़े लोगों के खिलाफ उनकी जांच और कार्रवाई कमजोर पड़ जाए।वहीं प्रशासन पर जनता का भरोसा तभी कायम रह सकता है , जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सम्मान और सुरक्षा मिले। लेकिन गरिमा ठाकुर के मामले में ठीक उलटा संदेश जा रहा है कि क्या बिलासपुर प्रशासन भ्रष्टाचारियों की ढाल बन रहा है? क्या ईमानदार अधिकारी को साइडलाइन करने की तैयारी है? या यह महज़ प्रशासनिक फेरबदल है जिसकी आड़ में बड़ी साजिशें छिपी हुई हैं? वहीं गरिमा ठाकुर का यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की पोस्टिंग का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि छत्तीसगढ़ का प्रशासनिक ढांचा भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने वाले अफसरों को कैसे देखता है। कलेक्टर संजय अग्रवाल का आदेश अब सिर्फ कागज़ी नहीं रह गया, बल्कि यह आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस और प्रशासनिक समीक्षा का अहम मुद्दा बनेगा और वही इस स्थानांतरण की खबर मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर राजस्व विभाग के मंत्री टंकराम वर्मा और सचिव के पास पहुंच चुकी है, देखना है कि इस मामले पर विभागीय मंत्री टंकराम वर्मा कलेक्टर से क्या सवाल जवाब करते हैं।


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