गौरेला पेंड्रा मरवाही/नूर मोहम्मद/ ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की पहचान और अस्मिता से जुड़ा राजभाषा आयोग एक बार फिर सुर्खियों में है। आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति को लेकर साहित्यकारों और राजभाषा प्रेमियों में इंतजार लंबा होता जा रहा है। चर्चाओं का बाज़ार गर्म है कि जिस तरह पूर्ववर्ती रमन सरकार ने राजभाषा आयोग की कमान ब्राह्मण समाज को सौंप दी थी, उसी परंपरा को वर्तमान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार भी दोहराने जा रही है।साहित्यकारों और युवाओं का आरोप है कि छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति के लिए जी-जान से काम करने वाले युवा रचनाकारों को बार-बार दरकिनार कर दिया जाता है। उनका कहना है कि सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, राजभाषा आयोग में वही चेहरे और वही जातिगत समीकरण हावी रहते हैं।
सूत्रों का कहना है कि अध्यक्ष पद के लिए पूर्व अध्यक्ष विनय पाठक, हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज चंद्रभूषण बाजपेयी, रामानंद त्रिपाठी, रामेश्वर शर्मा, पीसी लाल यादव, दुर्गा प्रसाद पारकर,युवा चेहरे में रितुराज साहू सहित लगभग 50 दावेदार इस दौड़ में शामिल हैं। भाषा प्रेमियों का सवाल है कि जब आयोग का उद्देश्य छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति को बढ़ावा देना है, तो फिर स्थानीय युवाओं और सक्रिय साहित्यकारों को अवसर क्यों नहीं दिया जा रहा? क्या राजभाषा आयोग सचमुच भाषा के उत्थान के लिए है या फिर राजनीतिक उपकृतियों और जातिगत हित साधने का मंच बन गया है?
राजभाषा प्रेमियों के बीच चर्चित व्यंग्य यही है कि राजभाषा आयोग में नई सरकारें आती हैं, लेकिन नियुक्तियां पुरानी सोच की ही झलक देती हैं।


