तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की अफसरशाही में गुरुवार को हुए बड़े उलटफेर ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि यहां वरिष्ठता से ज्यादा सत्ता की नजदीकी मायने रखती है। राज्य सरकार ने प्रशासनिक परंपराओं और दशकों पुराने संतुलन को किनारे रखते हुए प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी विकास शील को सीधे मुख्य सचिव की कुर्सी पर बिठा दिया।अब सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इतने वर्षों तक मेहनत करके वरिष्ठ अधिकारी केवल “देखते रहो” की कतार में खड़े रहने के लिए ही बने हैं? जब फैसले योग्यता और अनुभव पर नहीं, बल्कि सत्ता के संकेत पर हों, तो अफसरशाही भी राजनीति की तरह चाटुकारिता की प्रयोगशाला बन जाती है। इस नियुक्ति से प्रशासनिक गलियारों में फुसफुसाहट तेज है कि वरिष्ठ अफसरों की फाइल में धूल ही बची है, असली ताज तो सरकार के भरोसेमंद को ही मिलेगा।वरिष्ठों की अनदेखी से जहां सिस्टम में असंतोष की खामोश लहर दौड़ी है, वहीं यह भी स्पष्ट हो गया है कि मुख्य सचिव की कुर्सी अब सेवा पुस्तिका से नहीं, बल्कि सत्ता की पुस्तिका से तय होगी। छत्तीसगढ़ की नौकरशाही अब पूछ रही है कि क्या भविष्य में वरिष्ठता का कोई मूल्य बचेगा, या फिर हर अफसर को सिर्फ यही सीखना होगा कि “ऊपर” का भरोसा ही सबसे बड़ा प्रमोशन है?


