तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया ए बात सिरिफ नारा नइये, ए हमर असली पहिचान आय। आज के बखत म जब दुनियाभर म अपन-अपन संस्कृति अऊ भाषा के संरक्षण बर कोसिस होवत हे, त छत्तीसगढ़िया मन के जिम्मेदारी बढ़ जाथे कि अपन मातृभाषा छत्तीसगढ़ी के मान-सम्मान बढ़ाहीं अऊ ओकर प्रचार-प्रसार दूर-दूर तक कराहीं।छत्तीसगढ़ी भाषा सिरिफ बोली नइये, ए म हमर भाव, हमर गीत, हमर गोठ-बात, हमर तीज-त्यौहार, अऊ हमर परंपरा के गहराई समाय हवय। जब ले हमन अपन भाखा म गर्व नइ करबो, तब ले दूसर मन काबर सम्मान करही? आज जरूरत ये बात के हवय कि स्कूल-काॅलेज म छत्तीसगढ़ी भाषा पढ़ाय जावय, शासन-प्रशासन के कामकाज म छत्तीसगढ़ी के जगह मिले, सोशल मीडिया, पत्रिका, समाचार म छत्तीसगढ़ी के जादा इस्तेमाल होय, अऊ सबसे जरूरी, घर-परिवार लेच छत्तीसगढ़ी गोठ-बात के शुरुआत होय।माटी के गंध म, मया के छांव म,छत्तीसगढ़ी गोठ म, सोनहा भाव म।भाखा ल बचाबो, मान बढ़ाबो,दुनिया भर म अपन छत्तीसगढ़ चमकाबो।जब हमन मिल-जुल के अपन भाखा ला सहेजबो, अपन संस्कृति ला सजाबो, त दुनिया भर म छत्तीसगढ़ के अलग पहचान बनही।ए बात ला मत भूलव के भाषा बचही त संस्कार बचही, संस्कार बचही त अस्मिता बचही, अऊ अस्मिता बचही त छत्तीसगढ़ बचही।त चलव, सब मिलके संकल्प लेव –छत्तीसगढ़ ल बनाबो सुघ्घर परदेस, छत्तीसगढ़िया के संग अऊ छत्तीसगढ़ी भाषा के मान संग।


