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सत्ता बदली, नारे बदले… पर छत्तीसगढ़िया अभी भी ‘परदेसी’…!

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

आज छत्तीसगढ़ सरकार से लेकर उच्च न्यायालय तक इस समय रजत जयंती, सिल्वर जुबली, छत्तीसगढ़ को 25 साल पूरे होने के समारोह में व्यस्त है। मंच पर भाषण, दीप प्रज्वलन, और बधाई के नारों की गूंज है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस छत्तीसगढ़ के नाम पर यह राज्य बना, उसी छत्तीसगढ़ी भाषा का न तो सरकारी अस्तित्व बना और न ही छत्तीसगढ़ियों की पहचान को संवैधानिक सुरक्षा मिली।जश्न के मंच पर ताली बज रही है, पर छत्तीसगढ़िया मन अंदर ही अंदर सोच रहा है कि “हमर नाम के उत्सव, फेर हमर लहू-लोहा नई…”छत्तीसगढ़ में भाजपा के डॉ. रमन सिंह ने पूरे 15 साल तक छत्तीसगढ़ पर राज किया। वादा था विकास का, दावा था छत्तीसगढ़ के सम्मान का। मगर 15 साल बीतते-बीतते छत्तीसगढ़ी भाषा सरकारी फाइलों में भी कोने में पड़ी रह गई। रमन सिंह के राज में ‘चाऊर और मोबाइल’ तो बंटा, मगर छत्तीसगढ़िया अस्मिता की थाली आज भी खाली है तो वहीं कांग्रेस सरकार में भूपेश बघेल और ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ का भ्रमजाल2018 में कांग्रेस सत्ता में आई तो लगा कि अब छत्तीसगढ़िया पहचान का दौर आएगा। भूपेश बघेल ने बड़े जोर-शोर से नारा दिया था कि “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़”। लेकिन हकीकत यह निकली कि नवा छत्तीसगढ़ तो क्या बनता, पुराना भी भ्रष्टाचार की दलदल में धंस गया। किसानों के नाम पर, युवाओं के नाम पर, रोजगार के नाम पर हर जगह घोटालों की गूंज रही।वहीं अब भाजपा फिर सत्ता में है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का नया नारा है कि “हमने बनाया, हम हीं संवारेंगे।” नारे जरूर बदले, पर छत्तीसगढ़ की तस्वीर वही पुरानी। सड़क से लेकर रोज़गार तक, किसान से लेकर मजदूर तक सब आज भी सवाल पूछ रहे हैं। असलियत यह है कि दो साल पूरे होने के बाद भी भाजपा के कार्यकर्ता तक यह कहने से नहीं हिचकते कि सरकार का हाल जनता से भी छिपा नहीं है।सत्ता का खेल और छत्तीसगढ़ की असलियत यह है कि यहां पर सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की अस्मिता और छत्तीसगढ़ी भाषा अब भी उपेक्षा की शिकार है। यह सिल्वर जुबली नहीं, बल्कि “छत्तीसगढ़ियों के लिए कांस्य जुबली” है,जहाँ 25 साल में भी छत्तीसगढ़िया अपने ही घर में मेहमान बने हुए हैं।


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